Tuesday, 29 April 2014

जज़्बे...

और घूंगट उठा देना, और पलकें झुका देना,
अदा -ए -क़त्ल क्या कहने, क्या तेरा मुस्करा देना,
मैंने पूछा यह चेहरा है, या है कोई चाँद का टुकड़ा,
तेरा घूंगट उठा देना, और दीया बुझा देना।

मोहबत में और जंग में सब जायज़ होता है,
तेरा खुद में सिमट जाना, मेरी हिम्मत बढ़ा देना।

तेरा जलवा है यह साकी, या कोई और वजह शायद ,
भरी बरसात में उनका, चमन में आग लगा देना।

कोई ऐसी रात न होगी, खुराफ़त जब हुई न हो,
तेरा ख्वाबों में आ जाना, मेरे जज़्बे जगा देना।

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