Tuesday, 29 April 2014

हवा कुछ यूं चली...

हवा कुछ यूं चली कि उड़ गए सब घोंसले,
टकरा के तूफां से पक्षी फड़-फडाता रह गया।

बह गया कानून भी भावनाओं के वेग में,
फिर तिरंगा शान से लह-लहाता रह गया।

मकतल का मंजर था यह कि आतिशबाजी हो रही,
और आईने से कातिल मुंह छुपाता रह गया।

भूख जब हद से बढ़ी, खा गया खुद जिस्म को,
और पुजारी गीता का सार सुनाता रह गया।

इज्जत रही न रुतबा रहा, न रही उम्मीद भी,
झूठ के आँचल में सच, मुँह छुपाता रह गया।

देखते ही देखते कितना बदल गया चमन,
शिवलिंग पे चढ़ के फूल अपना कद बढाता रह गया।

जाँच कमीशन बिठायंगे दंगे थे या कतलाम था,
हँस पड़े ज़ख़्म छिछोरा मर्हम बनाता रह गया।

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